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ईद-उल-अज़हा के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य

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हमने यहाँ पर इस्लाम धर्म के सबसे बड़े त्योहार में एक ईद-उल-अज़हा (ईद उल ज़ुहा) के बारे
में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य प्रकाशित किया है. यह त्यौहार भारत पाकिस्तान, बांग्लादेश, सऊदी अरब और विश्व के बहुत से देशो में मनाया धूमधाम से मनाया जाता है. चलिए जानते है इस्लाम धर्म के त्यौहार ईद-उल-अज़हा के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बाते और कुछ महत्वपूर्ण तथ्य.

Facts and Importance About Eid-ul-Adha in Hindi

ईद-उल-अज़हा (ईद उल ज़ुहा) जिसे क़ुरबानी की ईद भी कहते है यह त्यौहार इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले लोगों प्रमुख त्यौहार होता है.

इस्लाम धर्म का ईद-उल-अज़हा त्यौहार रमजान के पवित्र महीने के खत्म होने लगभग 70 दिन के बाद मनाया जाता है.

इस्लामिक मान्यता के मुतबिक सबसे महान्‌ वंशजों में से एक हज़रत इब्राहिम अपने पुत्र को खुदा के हुक्म पर खुदा कि राह में कुर्बान करने किया था और खुदा ने उनके पुत्र को जीवनदान दिया था. उनकी याद में ईद-उल-अज़हा त्यौहार मनाया जाता है.

“बकरीद” शब्द का अर्थ में बकरों से कोई संबंध नहीं है. “बकरीद” शब्द में, अरबी में ‘बक़र’ का अर्थ होता है, बड़ा जानवर जो जि़बह किया (काटा) गया.

भारत पाकिस्तान व बांग्लादेश में ईद-उल-अज़हा को “बकरा ईद” कहते है. और ईद-ए-कुर्बां का मतलब होता है – बलिदान की भावना

इस्लाम धर्म के कुरान में कहा गया है की “हमने तुम्हें हौज़-ए-क़ौसा दिया तो तुम अपने अल्लाह के लिए नमाज़ पढ़ो और कुर्बानी करो”

हिजरी के आखिरी महीने जुल हिज्ज में पूरी दुनिया के मुसलमान मक्का सऊदी अरब के इकट्ठा होकर हज मनाते है और ईद उल अजहा का त्यौहार भी इसी दिन मनाया जाता है.

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ईद उल अजहा का अर्थ “त्याग वाली ईद” भी होता है.

ईद उल अजहा के दिन जानवर की कुर्बानी देना एक प्रकार की प्रतीकात्मक कुर्बानी माना जाता है.

ईद उल अजहा का त्यौहार 2 सन्देश देता है “एक परिवार के बड़े सदस्य को स्वार्थ के परे देखना चाहिए और व्यक्ति को खुद को मानव उत्थान के लिए लगाना चाहिए.

मुसलमानों के लिए अपनी जिंदगी में एक बार हज करना जरूरी होता है और हज होने की खुशी में ईद-उल-जुहा का त्योहार मनाया जाता है.

इस्लाम धर्म में बलिदान का बहुत बड़ा महत्व है और ईद-उल-अज़हा को बलिदान का त्योहार भी कहते है.

ईद-उल-अज़हा पर क़ुर्बानी का एक उद्देश्य ग़रीबों को भी अपनी ख़ुशियों में भागीदार बनाना होता है.

कहा जाता है कुर्बानी के बाद को तीन हिस्सों में बाटना चाहिए ” एक अपने लिए, दूसरा पड़ोसियों के लिए और तीसरा ग़रीबों व यतीमों के लिए रखना चाहिए.

कहते है की एक अच्छे समाज के निर्माण में बलिदान और समर्पण की भावना का विशेष योगदान होता है.

बलिदान और समर्पण की भावना से समाज में एकता व भाईचारे बढ़ता है और समाज प्रगति करता है.

क़ुर्बानी का महत्व होता है की ईश्वर या अल्लाह से असीम लगाव और प्रेम का इज़हार करना.

कहते है की प्रेम को दुनिया की वस्तु या इन्सान से ऊपर रखना चाहिए.

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