जनमेजय के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य

इस भाग में आप कुरुवंश के राजा जनमेजय के इतिहास बारे में महत्वपूर्ण तथ्य और उनके जीवन परिचय के बारे में सामान्य ज्ञान की जानकारी पढ़ सकेंगे.

Important facts about of Janamejaya in Hindi

  • महाभारत के अनुसार जनमेजय कुरुवंश का राजा था, जिस समय अर्जुनपुत्र अभिमन्यु महाभारत युद्ध में मारा गया था उसकी पत्नी उत्तरा गर्भवती थी जिसके जन्म से राजा परीक्षित जन्मे जो युद्ध समाप्ति के बाद हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठा. जनमेजय परीक्षित तथा मद्रावती का पुत्र था.
  • महाभारत के अनुसार जनमेजय मद्रावती जनमेजय की माता थी, परन्तु भगवत् पुराण के अनुसार उनकी माता ईरावती थी जोकि उत्तर की पुत्री थी.
  • महाभारत मे कक्षसेन, उग्रसेन, चित्रसेन, इन्द्रसेन, सुषेण तथा नख्यसेन जनमेजय के छः और भाई बताये गये हैं।
  • जनमेजय की विजय के प्रसंग महाकाव्य के आरम्भ के पर्वों में तक्षशिला तथा सर्पराज तक्षक के ऊपर की गई है.
  • जनमेजय के पिता परीक्षित की मृत्यु के बाद पश्चात् हस्तिनापुर की राजगद्दी संभाली.
  • परीक्षित पाण्डु के एकमात्र वंशज थे जिसका जिक्र पौराणिक कथा में किया गया है, इनको एक श्रंगी ऋषि ने शाप दिया था की उसकी मृत्यु सर्पदंश से प्राप्त होगी और ऐसा ही हुआ जोकि सर्पराज तक्षक के कारण संभव हुआ. इसकारण जनमेजय बहुत आहात हुए और उन्होंने सर्पवंश का पूरा नाश करने का फैसला लिया इसके लिए उन्होंने सर्प सत्र या सर्प यज्ञ का आयोजन किया और यह यज्ञ इतना भयानक था की विश्व के सभी सर्पो का धीरे धीरे महाविनाश होने लगा था.
  • उनके द्वारा किए जा रहे सर्प-विनाश यज्ञ के समय एक बाल ऋषि अस्तिक यज्ञ परिसर में आये जिनकी माता मानसा एक नाग और पिता एक ब्राहमण थे.
  • इस संदर्भ में कुछ जातियों ने इसके रीती-रिवाज को स्वीकार परन्तु कुछ ने इसको नाकार दिया था, इस जन-जाती को आर्य पृथक-पृथक दे दिया करते थे. यही कारण है जिसके द्वारा लिखे या बोले गये ग्रन्थों में यही नाम आज भी उजागर होते हैं।
  • आर्यों ने इन जन-जातियों को ऐसे नाम दिए जिनसे वे खुद भयभीत होते हो और उनके वश में कोई ना आ सके जैसे; नाग, असुर, दानव इत्यादि.
  • तो अगर जनमेजय का उद्देश्य सम्पूर्ण नाग वंश का नाश करना था तो आर्यों की नजर में भारत की कोई भी जन-जाति, जो उनके वश में नहीं थी और जिसका उन्होंने नाग से नामकरण कर दिया था, उस जन-जाति का विनाश होने जा रहा था.
  • जनमेजय ने अस्तिक के आग्रह के कारण सर्प सत्र या यज्ञ समाप्त कर दिया था, तब फिर वैशम्पायन जोकि वेड व्यास के सबसे प्रिय शिष्य थे वहां पर प्रस्थान किया जिनसे जनमेजय ने अपने पूर्वजों के बारे में पूछना चाहा तब वेदव्यास शिष्य वैशम्पायन ने जनमेजय को भरत से लेकर कुरुक्षेत्र युद्ध तक कुरु वंश का पूरा वृत्तांत बताया जिसे उग्रश्रव सौती ने भी सुना और नैमिषारण्य में सभी ऋषि समूह, जिनके प्रमुख शौनक ऋषि थे, को भी सुनाया।

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