मॉब लिंचिंग: अर्थ, संविधान में जीने का अधिकार, कारण और प्रभाव, अनुच्छेद 21, निष्कर्ष

मॉब लिंचिंग संदर्भ (Mob Lynching Context in Hindi)

बीते कुछ वर्षों में सार्वजनिक रूप से भय का माहौल बनाने और स्वयं न्याय करने की होड़ ने जन सामान्य को हासिये पर लाकर खड़ा कर दिया है. भीड़ की कोई शक्ल नहीं होती और जब भीड़ ही अपराधी बन जाए, तो न्याय व्यवस्था और शासन प्रशासन पर भी सवाल उठने लगता है. भीड़ के रूप में असामाजिक तत्व जब सड़क पर ही न्याय करने के लिए आतुर हो जाएं, तो यह एक  विचारणीय मुद्दा बन जाता है. बिना किसी व्यवस्थित न्याय प्रक्रिया और अनौपचारिक समूह के द्वारा हत्या करना धमकाना मॉब लिंचिंग के अंतर्गत आता है.

क्या होती है मॉब लिंचिंग? (What is Mob Lynching in Hindi)

जब अनियंत्रित भीड़ के द्वारा आपराधिक रूप से कोई हिंसा की जाती है अर्थात पीटना, प्रताड़ित करना, जान से मार देना तो इस प्रकार के हिंसक कृत्य को मॉब लिंचिंग (mob lynching) कहा जाता है.

आसान शब्दों में कहें तो जब किसी दोषी को उसके अपराध के लिए कभी – कभी मात्र अफवाहों को आधार मानकर त्वरित कार्रवाई करते हुए सजा देना, उसे पीटना या उसकी हत्या करना, मॉब लिंचिंग कहलाता है. इस प्रकार की हिंसा में किसी भी कानूनी प्रक्रिया या सिद्धांत का पालन नहीं किया जाता यह प्रक्रिया पूर्णता गैर कानूनी और गैर संवैधानिक होती है. उदाहरण के लिए हम बीते वर्षों में जाएं तो 2017 में पहलू खान हत्याकांड इसका सटीक उदाहरण है, जिसमें कुछ गौ सेवकों की भीड़ ने गौ तस्करी के आरोपों में पहलू खान की मारपीट करके हत्या कर दी यह राजस्थान से संबंधित घटना थी और इसके बाद 2019 में पालघर में भी चोरी के शक में 2 साधुओं की स्थानीय भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या की थी जो मॉब लिंचिंग का जीता जागता उदाहरण है.

संविधान में जीने का अधिकार (Constitution Right in India)

भारतीय संविधान अपने प्रत्येक नागरिक को जीने का अधिकार प्रदान करता है. और यह विश्वास भी दिलाता है कि संविधान द्वारा स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं के अंतर्गत किसी भी नागरिक को उसके जीवन में व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि ईश्वर की अनुकंपा से कोई भी इंसान जब धरती पर जन्म लेता है तो उसे स्वतंत्र रूप से जीवन जीने, अपनी आवश्यकताओं और सपनों को पूरा करने के लिए प्रयत्न करने की, सवाल उठाने की तथा कार्य करने की आजादी होती है, बशर्ते यह कानूनी दायरे में हो, मानव अधिकारों ने शुरू से ही एक स्वतंत्र जीवन की नींव रखी है जो पवित्र, अहिंसक, अविभाज्य और सार्वभौमिक होते हुए गरिमा पूर्ण हो, जीवन के अधिकार के तीन महत्वपूर्ण तत्व है, जीवन, स्वतंत्रता, स्वाभिमान और गरिमा. समय के साथ बढ़ती न्यायिक सक्रियता तथा मानवाधिकारों की चिंता के कारण भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के दायरे का विस्तार किया गया है. 

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मानव अधिकारों का पहला वैचारिक उदाहरण हम्मूराबी की टेबलेट में पाया जाता है. हम्मूराबी जो पहले सुमेरियन राजा थे तथा उनके कानूनी दस्तावेजों में लोगों पर हुए अन्याय पूर्ण तथा मनमानी उत्पीड़न और सजा से बचाने की जानकारी भी मिलती है, देश में मानव अधिकार प्राप्त कानून के उद्भव के साथ प्राकृतिक अधिकारों का पर्याय बन गया था, जीवन की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अवधारणा ऋग्वेद और महाभारत जैसे प्राचीन भारतीय साहित्य ग्रंथों में भी मिलती है, भारतीय संविधान में भी जीवन जीने के अधिकार को मूल अधिकारों की श्रेणी में रखा गया है जिसे अनुच्छेद 21 कहते है, साथ ही समय – समय पर मानवाधिकार आयोग के द्वारा तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के द्वारा आम जनता में जिनमें युवा, बच्चे, बेरोजगार महिलाएं सभी शामिल हैं, उनको उनके आस – पास व्याप्त समस्याएं जैसे एक न्यूज़, हैकिंग, तस्वीरों से छेड़छाड़, पोर्नोग्राफी, असामाजिक तत्वों द्वारा की जाने वाली अपराधिक घटनाएं इन सब से बचते हुए उनका निदान खोजने का, विरोध करने का तथा उचित कानूनी क्रियाओं का पालन करने का आग्रह किया जाता है  एवं आत्महत्या जैसी घटनाओं से भी दूर रहने, डिप्रेशन, मानसिक कष्ट आदि परेशानियों में परिवार एवं दोस्तों की सलाह से समाधान ढूंढना और बिना किसी भय के सुखद जीवन व्यतीत करने कि सलाह दी जाती है.

अनुच्छेद 21 (Article 21)

संविधान के भाग 3 के अनुच्छेद 21 में भारत में रहने वाले नागरिकों को जीवन और स्वतंत्रता का यह मौलिक अधिकार दिया गया है. इन मौलिक अधिकार के अंतर्गत भारत में रहने वाला प्रत्येक नागरिक अपने जीवन अथवा प्राणों की रक्षा़ हेतु समस्त जानकारी निजी रूप से रखने के लिए स्वतंत्र हैं जिसे निजता का अधिकार भी कहा जाता है. व्यक्तिगत स्वह्त्त्यता का अधिकार, किसी व्यक्ति और व्यक्ति की संपत्ति का अधिकार तथा अनुच्छेद 21 मे सार्वजनिक जांच या जोखिम से मुक्त होने का अधिकार, वर्तमान में लोगों की निजी जिंदगी और निजी जानकारी में हस्तक्षेप से निजता के अधिकार हनन होने की संभावना है.

अनुच्छेद 21 के अंतर्गत व्यक्ति को जीने का अधिकार है. यह अनुच्छेद भारत के प्रत्येक नागरिक के जीवन जीने और उसकी स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है. यदि कोई अन्य व्यक्ति या कोई संस्था किसी व्यक्ति के इस अधिकार का उल्लंघन करने का प्रयास करता है तो पीड़ित व्यक्ति को सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाने तक का अधिकार होता है, कोई भी व्यक्ति अथवा व्यक्तियों का समूह अनौपचारिक, असामाजिक और असंवैधानिक रूप से गैरकानूनी साधनों का प्रयोग करके किसी व्यक्ति की हत्या या उसे प्रताड़ित नहीं कर सकता क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को जीने का अधिकार प्राप्त है. आमतौर पर किसी व्यक्ति के निजी जीवन में हस्तक्षेप करना भी कानूनन अपराध है क्योंकि भारतीय संविधान देशभर के सभी नागरिकों को प्रदान किए गए सभी अधिकारों की रक्षा करता है. इस संविधान के अनुसार देश के सभी नागरिकों के लिए मौलिक अधिकार तय किए गए हैं. हमारे देश में भारत के नागरिकों के लिए बराबरी का अधिकार, शैक्षणिक तथा सांस्कृतिक अधिकार आदि समान माने गए है. ऐसी स्थिति में किसी भी व्यक्ति के जीवन में किसी अन्य व्यक्ति के जबरदस्ती हस्तक्षेप पर रोक लगाई जा सकती है इसमें किसी भी व्यक्ति की निजी जिंदगी तथा पारिवारिक सम्मान आदि सम्मिलित होती है.

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निष्कर्ष (Conclusion)

मोब लिंचिंग मे अक्सर देखा जाता है कि कभी धर्म के नाम पर, कभी पहनावे के नाम पर, कभी खानपान, कभी गौ रक्षा, कभी मंदिर – मस्जिद इन्हें मूल में रखकर अनावश्यक संघर्ष किया जाता है जो देश की अखंडता, सामाजिकता और न्याय व्यवस्था को खंडित करता है. इसे पुर्णतः प्रतिबंधित किया जाना चाहिए. जब कोई व्यक्ति अपराध करता है तो पुलिस तथा न्यायालय उसे सजा देते हैं परंतु भीड़ द्वारा सड़क पर ही न्याय करना, देश की अखंडता को और शांति पूर्ण वातावरण को प्रदूषित करता है. हिंदू  – मुस्लिम और दलित के नाम पर होने वाली अनावश्यक हत्याएं भी बंद होनी चाहिए. 

यदि मॉब लिंचिंग को रोकने के जरूरी सुझावों पर नजर डालें तो लोगों को अपनी सोच में परिवर्तन लाना होगा, सभी धर्मों को, सभी समुदायों को अपना मान कर कदम से कदम मिलाकर चलना होगा और सुख – दुख में एक दूसरे का साथ देते हुए देश को नई ऊंचाइयों पर लाने का प्रयास करना होगा क्योंकि लंबे समय से हमारे देश में धर्म और जाति को प्रमुखता दी गई है. हमारे भारत में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के बीच में भी मतभेद है और जब तक यह मतभेद समाप्त नहीं होगा तब तक मॉब लिंचिंग भी नहीं रुकेगी मॉब लिंचिंग का यह परिणाम सामने आता है कि कई बार भीड़ सही और गलत की तुलना नहीं कर पाती जो निर्दोष होते हैं उन्हें मात्र अफवाह और शक के आधार पर कठिन सजा का शिकार होना पड़ता है और हत्याएं भी हो जाती हैं. 

मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएं पूर्णतः गैरकानूनी हैं और अगर इन में सम्मिलित लोगों को सजा नहीं दी गई तो लोगों का संविधान पर से विश्वास उठ जाएगा क्योंकि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रत्येक व्यक्ति को जीवन जीने की स्वतंत्रता दी गई है लेकिन मोब लिंचिंग से व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन होता है. भारत का समाज पुरातन काल से ही एकजुट और अखंड रहा है.

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मॉब लिंचिंग भारत में रहने वाले लोगों को अलग-अलग समूहों में विभाजित करता है और असंतोष की भावना को भी उत्पन्न करता है मॉब लिंचिंग से देश के आर्थिक विकास को भी गहरा आघात पहुंचता है. मॉब लिंचिंग की उत्पत्ति नफरत की राजनीति का परिणाम है. यहां भारत में एक ओर देश धर्म के नाम पर बंटा हुआ है तो दूसरी और जातियों के रूप में बिभाजित है. सभी जातियां अपने आप को उच्च मानती हैं और सभी धर्म अपने आप को उच्च साबित करने की कोसिस में रहते हैं. ऐसी परिस्थिति में सभी समुदायों के बीच में अविश्वास और असंतोष बना रहता है. सभी धर्म दूसरे धर्मों पर अपनी धार्मिक गतिविधियां थोपना चाहते हैं,

सभी जातियां यह चाहती हैं कि हमारी जाति उच्च और प्रभावशाली बने जिसके कारण आपसी संघर्ष परिलक्षित होता है. ऐसा नहीं है कि मॉब लिंचिंग की किसी घटना के बाद कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होती है यदि कहीं मॉब लिंचिंग के अंतर्गत कोई हत्या होती है तो आईपीसी की धारा 302, 307, 323, 147, 148, 149 तथा 34 के तहत कार्रवाई की जाती है. सीआरपीसी की धारा 223 A के तहत मॉब लिंचिंग के खिलाफ कठोर कानून बनाने की सिफारिश की गई, परंतु इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि आज तक नहीं हो पाई है. केंद्र तथा राज्य सरकारों को चाहिए कि वह जनता के बीच में यह संदेश पहुंचाएं कि कोई भी नागरिक कानून को अपने हाथ में नहीं लेगा किसी व्यक्ति की हत्या या उसे नुकसान पहुंचाने जैसे कार्यों में ना भाग लेगा, ना ही उन्हें करने का प्रयास करेगा. सरकारों को जनता के बीच में प्रशासन के माध्यम से संविधान तथा आईपीसी की धाराओं के बारे में भी जानकारी पहचानी चाहिए जिससे कि जनता को पता हो कि किस अपराध का क्या दंड होता है जिससे कि जनता और नागरिक अपराध से दूर रहें और मॉब लिंचिंग जैसे अपराध और घटनाएं नियंत्रित हो सकें साथ ही केंद्र सरकार को चाहिए कि शीघ्र अति शीघ्र कठोर कानून बनाकर मॉब लिंचिंग पर प्रतिबंध लगाया जाए ताकि धर्म के नाम पर हिंसा ना हो.

देश के सभी वर्ग तथा समुदाय आपस में सामंजस्य बनाकर प्रेम पूर्वक रह हें. सभी धर्मों का, सभी समुदायों का सम्मान हो जिससे देश सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत बना रहे.

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